शुक्रवार, 14 मई 2010

" मैं और मेरी चाहत "

दिल मे उठे कुछ सवालों के जवाब चाहता हूँ मैं
बेगानों से क्या, अपनों ,से कुछ जवाब चाहता हूँ मैं,
आने से पहले ही ना जाने कितनी ज़िन्दगी खत्म कर दी हमनें
और कितनी ज़िन्दगी तबाह करनी है उनका हिसाब चाहता हूँ मैं,
दिल मे उठे कुछ सवालों के जवाब चाहता हूँ मैं.......

कुछ कमर तोड़ दी मंहगाई ने, कुछ आपसी लड़ाई ने
दर-दर कि ठोकरें खाने को मजबूर कर दिया ,
इज्जत कि दो रोटी कि भरपाई ने
गरीबों में अपनी खुशबूं फैलाए, ऐसा गुलाब चाहता हूँ मैं,
दिल मे उठे कुछ सवालों के जवाब चाहता हूँ मैं......

डरी-डरी, सहमी- सहमी सी है कुछ निगाहें
आजाद होकर भी गुलाम है उनकी राहें,
निडर, बैखोफ होकर जिए, भारत कि हर नारी
अधूरा है, पूरा हो जाये, ये ख्वाब चाहता हूँ मैं,
दिल मे उठे कुछ सवालों के जवाब चाहता हूँ मैं......

चंद सिक्कों के लिए अपनी इज्जत का सोदा कर रहे है
अपने घरों मे दोस्तों के भेष मे दुश्मन भर रहे है,
"राज" को अपनी धरती फिर से गुलाम होती नज़र आ रही है
मिटा दे जो दुश्मनों को, फिर कोई आजाद जैसा नवाब चाहता हूँ मैं,
दिल मे उठे कुछ सवालों के जवाब चाहता हूँ मैं......

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